भारत ने पश्चिमी देशों की नकल कर अपने संयुक्त परिवार, संस्कार व समाज की खुशहाली खो दी है : डॉ एरिक गेडेस

 

 मिशिगन यूनिवर्सिटी के सोशियोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. एरिक गेडेस ने कहा है कि भारत ने मेरे देश की नकल कर अपने संयुक्त परिवार, संस्कार व समाज की खुशहाली खो दी है। साथ ही बुर्जुगों की उपेक्षा कर नशा, अकेलापन पाया है। मुझे समझ नहीं आता कि अपनी इतनी सुंदर, इतनी महान संस्कृति में क्या कमी नजर आती है उन्हें कि वेस्ट की नकल करने में लगे हैं। भारतीय पहनावा, यहां की जीवनशैली, तीज त्योहार और इन सबके पीछे साइंस और मेडिकल लॉजिक है। मैं समझ नहीं पाता हूं कि अपनी प्रचीनतम और महान संस्कृति को छोड़ हमारी नकल से क्या हासिल हो रहा है। बल्कि मैं तो कहूंगा किहिंदुस्तान ने अपने संयुक्त परिवार खोकर बहुत कुछ खोया बच्चों संस्कार, बुजुर्गों की खुशी, नैतिकत भी खोई और मेरे देश की नकल कर नशा, लालच और अकेलापन पाया है।

  मैं कई बार भारत आया हूं और हर बार में यहां लोगों को पश्चिमी देशों की नकल करते देख हैरान रह जाता हूं। क्या आप जानते हैं कि अमेरिका में युवाओं की मृत्यु और आत्महत्याओं का कारण क्या है? पहली वजह है दुर्घटनाएं सिर्फ सड़क हादसे नहीं, बल्कि पहाड़ों और ऊंची इमारतों से रोमांचक कारनामे करने में होने वाले हादसे भी इसमें शामिल हैं। वहां यह सब इसलिए हुआ क्योकि विवेक अभी विकसित नहीं हुआ, वे शराब और ड्रग्स के नशे में धुत है। दूसरा बड़ा कारण है सुसाइड। यहां के युवा हैं जिन्हें सारे ऐश ओ-आराम हासिल है, फिर भी उनमें एक अजीब सा खालीपन है और तीसरा कारण है इस एज वैकेट में मर्डर्स बदले की भावना में, इण्र्या और अकेलेपन से जन्मी कुंठा में वह कत्ल तक कर रहे हैं और इन तीनों कारणों की जड़ में है वहां के परिवारों का बिखराव। किसी भी समाज का आधार मजबूती से बंधे परिवार है। परिवार खत्म हो  तो सामाजिक ढांचा गड़बड़ाएगा ही। रिश्तों में गहरा प्रेम होता है तो बच्चे ऐसा कोई काम नहीं करते जिससे परिवार को चोट पहुंचे या उनके सम्मान पर दाग लगे। जब यह अटैचमेंट नहीं होता तो बच्चे रास्ता भटक जाते हैं। उन राहों पर निकल पड़ते हैं जो आकर्षक तो हैं लेकिन पतन की ओर ले जाते हैं और हिंदुस्तान में बीते 10 सालों में यह सब बहुत बढ़ गया है। मुझे कहने कोई संकोच नहीं है  कि यह नैतिक कैंसर भारत ने मेरे देश से ही पाया है।

भगवान के घर में ही सादे कपड़ों के लिए अपमान हो तो वहां धर्म कहां, बस पाखंड है - डॉ गेडेस

सोशियोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. एरिक गेडेस ने धर्म की आड़ में दुनिया में सबसे बड़े पाखंड धर्म की आड़ में किए जा रहे हैं। और यह किसी एक धर्म या देश में नहीं हो रहा। दुनिया भर के हर रिलीजन का हाल यही है। चूंकिमैं क्रिश्चियन हूँ इसलिए अपने धर्म के बारे में कहूंगा। एक वाकया सुनिए जब मैं 13 साल का था और परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। चर्च में ंमहंगे, लकदक कपड़े पहनकर आने का नियम था जो खरीदने की हमारी हैसियत नहीं थी। मेरी मां कई बार उसके पुराने सादे कपड़ों की वजह से अपमानित होकर लौटी। जब ईश्वर के घर में ही कपड़ों के लिए किसी का अपमान किया जा रहा है तो वहाँ धर्म कहाँ होगा, यह पाखंड़ के सिवाय कुछ भी नहीं और यह ईश्वर के बनाए नियम नहीं हैं। यह तो इंसानी फरमान हैं जो चंद रसूखदारों ने बना दिए थे।

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